धरमंगल पांडेय की तपस्या से जुड़ी लोककथा, कौड़ी और नई फसल चढ़ाकर मनौती मांगते हैं श्रद्धालु; तीन दिवसीय मेले में दूर-दराज से पहुंचते हैं भक्त।
सुलतानपुर: उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिला मुख्यालय से करीब 32 किलोमीटर दूर स्थित पांडेय बाबा ब्रह्मधाम सदियों से आस्था और लोकविश्वास का केंद्र बना हुआ है। क्वार महीने में विजयादशमी के अवसर पर यहां लगने वाले तीन दिवसीय मेले में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। आसपास के जिलों के अलावा दूसरे प्रदेशों से भी लोग बाबा के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। पांडेय बाबा धाम में कौड़ी, कराही, फूल-माला और नई फसल चढ़ाने की परंपरा है। श्रद्धालु यहां मनौती मांगते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि के साथ पशुधन की रक्षा की कामना करते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, सच्चे मन से बाबा की पूजा करने पर मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
पांच साल की उम्र में माता-पिता को खोया, तपस्या से जुड़ी है कथा
पांडेय बाबा धाम से जुड़ी लोककथा करीब 360 वर्ष पुरानी बताई जाती है। किंवदंती के अनुसार, बढ़ौनाडीह में एक ब्राह्मण परिवार में धरमंगल पांडेय का जन्म हुआ था। बताया जाता है कि महज पांच वर्ष की उम्र में माता-पिता को खोने के बाद उनका मन सांसारिक जीवन से हटकर तपस्या में रम गया। लोकमान्यता के मुताबिक, उन्होंने घने जंगल में कठिन साधना शुरू की। कहा जाता है कि गर्मी के मौसम में वे पंचाग्नि के बीच तपस्या करते थे, सर्दियों में जल में रहकर साधना करते और बरसात के दौरान खुले आसमान के नीचे बैठते थे। धीरे-धीरे उनकी तपस्या की चर्चा आसपास के इलाकों में फैलने लगी। उनसे जुड़ी लोककथा में उनके तपोबल का वर्णन भी मिलता है। मान्यता है कि उनकी साधना का प्रभाव इतना अधिक था कि उनके वस्त्र आसमान में ही सूख जाते थे। ये प्रसंग स्थानीय लोकविश्वास का हिस्सा हैं और पीढ़ियों से सुनाए जाते रहे हैं।
राजकुमार से विवाद और रग्घू जल्लाद की कथा
पांडेय बाबा से जुड़ी एक अन्य किंवदंती स्थानीय राजघराने के राजकुमार से विवाद की कहानी सुनाती है। लोककथा के अनुसार, एक दिन शिकार के दौरान राजकुमार और धरमंगल पांडेय के बीच विवाद हो गया। इसके बाद राजकुमार ने गोमती नदी के दूसरे किनारे स्थित सराय के लोगों को उन्हें मारने के लिए भेजा। इस क्षेत्र को वर्तमान में मीठापुर-चौपरिया इलाके से जोड़कर बताया जाता है।
कथा के मुताबिक, धरमंगल पांडेय के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर भेजे गए लोग लौट आए। इसके बाद रग्घू नाम के एक जल्लाद को उनकी हत्या की जिम्मेदारी सौंपी गई। उसे चेतावनी दी गई कि ऐसा नहीं करने पर उसके परिवार को राजद्रोह के आरोप में दंडित किया जाएगा। लोककथा में बताया जाता है कि रग्घू भी धरमंगल पांडेय को देखकर तीन दिन तक उनकी हत्या करने का साहस नहीं जुटा सका। बाद में उसने उनके सामने पूरी साजिश बताई और अपने परिवार की रक्षा की गुहार लगाई। कथा के अनुसार, धरमंगल पांडेय ने उसे दोषमुक्त बताते हुए कहा कि वह राजधर्म का पालन कर रहा है। इसके बाद जल्लाद ने उनकी हत्या कर दी। यह पूरा प्रसंग स्थानीय किंवदंती के रूप में प्रचलित है; इसकी ऐतिहासिक पुष्टि के लिए स्वतंत्र ऐतिहासिक स्रोत उपलब्ध होना आवश्यक है।
पीपल के वृक्ष में स्थापना और विजयादशमी के मेले की परंपरा
स्थानीय मान्यता के अनुसार, धरमंगल पांडेय की मृत्यु के बाद क्षेत्र में उन्हें ब्रह्मस्वरूप मानकर पूजा जाने लगा। लोककथा में बताया जाता है कि वे स्वप्न के माध्यम से लोगों से अपने लिए स्थान मांगने लगे। इसके बाद क्षेत्रवासियों ने नवरात्र के नौ दिनों तक शांति पाठ कराया और क्वार महीने की विजयादशमी पर उनके आश्रम के पीपल वृक्ष में उनकी स्थापना की। मान्यता है कि तभी से यहां विजयादशमी के अवसर पर मेले की परंपरा शुरू हुई। आज भी यह मेला धार्मिक आयोजन के साथ-साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बना हुआ है। पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं श्रद्धालुओं को इस धाम से जोड़े रखती हैं।

पशुधन की रक्षा के लिए चढ़ाते हैं कौड़ी और माला
पांडेय बाबा धाम में पशुधन की रक्षा से जुड़ी मान्यताओं का विशेष महत्व है। श्रद्धालु सावन के सोमवार या शुक्रवार को भी बाबा के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय विश्वास के अनुसार, बाबा की पूजा से पशुओं को बीमारियों से बचाने की कृपा मिलती है।
इसी आस्था के चलते पशुपालक अपने पशुओं की संख्या के बराबर कौड़ियां चढ़ाते हैं। इसके साथ फूल-माला अर्पित कर परिवार और पशुधन की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। नई धान की फसल चढ़ाने की भी परंपरा है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इससे घर में अन्न-धन की कमी नहीं होती।
कई राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों के पहुंचने का उल्लेख
पांडेय बाबा धाम की पहचान स्थानीय क्षेत्र से बाहर तक बताई जाती है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, यहां आम श्रद्धालुओं के साथ कई राजनीतिक और सामाजिक हस्तियां भी दर्शन-पूजन कर चुकी हैं। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री पंडित श्रीपति मिश्र, कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष पंडित केशरीनाथ त्रिपाठी, पूर्व केंद्रीय मंत्री बाबू केदारनाथ सिंह, डॉ. संजय सिंह, पंडित जय नारायण तिवारी, ओम प्रकाश सिंह, रामरतन यादव, विश्वनाथ दास शास्त्री, वरुण गांधी, देवेंद्र पांडेय और सूर्यभान सिंह के नाम शामिल हैं।
इन हस्तियों के दौरे से संबंधित अलग-अलग विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध होने पर उन्हें और स्पष्टता से प्रस्तुत किया जा सकता है।
आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक
पांडेय बाबा धाम में विजयादशमी पर लगने वाला मेला केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यह स्थानीय लोककथाओं, पारंपरिक रीति-रिवाजों और सामुदायिक आस्था से जुड़ा आयोजन है। कौड़ी चढ़ाने से लेकर नई फसल अर्पित करने तक, यहां की परंपराएं क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं। करीब 360 वर्ष पुरानी बताई जाने वाली इस आस्था परंपरा के चलते पांडेय बाबा धाम आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। हर वर्ष विजयादशमी पर जुटने वाली भीड़ इस धाम के धार्मिक और सामाजिक महत्व को रेखांकित करती है।



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