दिल्ली। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सहयोगी दल निषाद पार्टी ने मछुआरा समाज के आरक्षण के मुद्दे पर अपना रुख और सख्त कर दिया है। निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री संजय निषाद ने 21 अक्टूबर को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित महासम्मेलन में भाजपा से आरक्षण के सवाल पर जल्द फैसला लेने की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस मुद्दे पर निर्णय नहीं हुआ तो उनकी पार्टी दूसरे राजनीतिक विकल्पों पर विचार कर सकती है।
संजय निषाद ने कहा, “साथ तभी देंगे, जब आरक्षण की बात होगी। बीजेपी को जल्द निर्णय लेना होगा। निर्णय नहीं हुआ तो दूसरा दरवाजा देखेंगे।” उनके इस बयान को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन के भीतर आरक्षण के मुद्दे पर बढ़ते दबाव के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, उन्होंने गठबंधन से अलग होने की कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है।
निषाद समाज को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग
निषाद पार्टी लंबे समय से मछुआरा समाज की विभिन्न उपजातियों को अनुसूचित जाति (SC) श्रेणी में शामिल करने और आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर निर्णय लेने की मांग करती रही है। पार्टी की मांग में मझवार और तुरैहा जैसी उपजातियों की स्थिति को स्पष्ट करने का मुद्दा भी शामिल है।
14 अक्टूबर को प्रकाशित टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, संजय निषाद ने कार्यकर्ताओं से 21 अक्टूबर को दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की थी। पार्टी ने इस कार्यक्रम को आरक्षण की मांग के समर्थन में आयोजित सम्मेलनों की श्रृंखला का हिस्सा बताया था।
दिल्ली के महासम्मेलन में संजय निषाद ने एक बार फिर इस मांग को प्रमुखता से उठाया। उनका कहना था कि निषाद समाज के आरक्षण के मुद्दे पर फैसला होना चाहिए। इस मांग को लेकर पार्टी नेतृत्व ने भाजपा से जल्द निर्णय लेने की अपेक्षा जताई है।
‘फैसला नहीं हुआ तो भाजपा को नुकसान हो सकता है’
महासम्मेलन में संजय निषाद ने आरक्षण के मुद्दे को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताते हुए चेतावनी दी कि मांग पर निर्णय नहीं होने का असर चुनाव में भी दिखाई दे सकता है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से संघर्ष के लिए तैयार रहने को कहा।
उन्होंने यह भी दावा किया कि निषाद पार्टी के समर्थन को भाजपा और समाजवादी पार्टी सहित विभिन्न राजनीतिक दल महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके मुताबिक, निषाद पार्टी के बिना सत्ता का समीकरण अधूरा रह सकता है।
ये संजय निषाद के राजनीतिक दावे और उनके भाषण का हिस्सा हैं। इन बयानों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी दल को चुनाव में कितना लाभ या नुकसान होगा। आगामी चुनाव में गठबंधन और सीटों से संबंधित तस्वीर संबंधित दलों की आधिकारिक घोषणाओं के बाद ही स्पष्ट होगी।
भाजपा के साथ गठबंधन पर बढ़ा दबाव
संजय निषाद की पार्टी उत्तर प्रदेश में भाजपा की सहयोगी है और वह प्रदेश सरकार में मंत्री भी हैं। ऐसे में आरक्षण के मुद्दे पर उनका सार्वजनिक रूप से कड़ा रुख अपनाना गठबंधन की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
इससे पहले भी संजय निषाद आरक्षण की मांग पूरी करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार से निर्णय लेने की अपील कर चुके हैं। अगस्त 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों में उन्होंने मांग पर कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में राजनीतिक नुकसान की चेतावनी दी थी। अब दिल्ली के महासम्मेलन में ‘दूसरा दरवाजा’ देखने की बात कहकर उन्होंने इस मुद्दे को फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी में भाजपा की ओर से महासम्मेलन में दिए गए इस अल्टीमेटम के जवाब में किसी नए फैसले या आधिकारिक प्रतिक्रिया की पुष्टि नहीं है। इसलिए फिलहाल यह कहना उचित नहीं होगा कि आरक्षण पर कोई नया निर्णय हो चुका है या गठबंधन में बदलाव तय हो गया है।
क्या निषाद पार्टी बदलेगी राजनीतिक रणनीति?
संजय निषाद के बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा आरक्षण की मांग पर क्या रुख अपनाती है और निषाद पार्टी आगे अपनी रणनीति किस दिशा में ले जाती है। ‘दूसरा दरवाजा’ देखने की चेतावनी राजनीतिक विकल्प खुले रखने का संकेत देती है, लेकिन इसे गठबंधन टूटने की घोषणा नहीं माना जा सकता।
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण का मुद्दा निषाद पार्टी की राजनीतिक मांगों में प्रमुख बना हुआ है। अब भाजपा की प्रतिक्रिया, आरक्षण से संबंधित आधिकारिक कदम और गठबंधन के नेताओं के बीच आगे होने वाली बातचीत पर नजर रहेगी।



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