सितंबर में उत्तर प्रदेश ने साइबर फ्रॉड की रकम रोकने के मामले में राष्ट्रीय औसत को पीछे छोड़ा; प्रदेश में 84 हजार जागरूकता अभियान चलाए गए
लखनऊ, 3 अक्टूबर। उत्तर प्रदेश में साइबर ठगी के खिलाफ पुलिस और संबंधित संस्थाओं की कार्रवाई में तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। सितंबर में यूपी में साइबर फ्रॉड ठगी की रकम फ्रीज कराने की प्रदेश की दर 34 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि राष्ट्रीय औसत 31 प्रतिशत रहा। इस तरह उत्तर प्रदेश की दर राष्ट्रीय औसत से तीन प्रतिशत अंक अधिक रही। प्रदेश में साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर के माध्यम से ठगी की रकम को जल्द रोकने और रिकवर कराने की प्रक्रिया संचालित की जा रही है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में साइबर अपराध की रोकथाम और ठगी के बाद धनराशि को सुरक्षित करने के लिए तकनीकी व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर के जरिए रियल टाइम रूटिंग और डेटा शेयरिंग की मदद से उन खातों तक कार्रवाई पहुंचाने की कोशिश की जाती है, जहां ठगी की रकम भेजी गई हो। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कुछ मामलों में निर्धारित समय सीमा के भीतर 100 प्रतिशत तक रिकवरी भी दर्ज की गई है। हालांकि, ऐसे मामलों की कुल संख्या और रिकवरी की विस्तृत अवधि से जुड़ा आंकड़ा उपलब्ध नहीं कराया गया है।
साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर से रकम रोकने की प्रक्रिया
साइबर ठगी की शिकायत मिलने के बाद समय पर कार्रवाई करना रकम को सुरक्षित करने के लिहाज से अहम माना जाता है। साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर के माध्यम से शिकायत पर संबंधित बैंक से संपर्क कर संदिग्ध लेनदेन की रकम रोकने की प्रक्रिया शुरू की जाती है। रियल टाइम रूटिंग और डेटा साझा करने के जरिए उस धनराशि को फ्रीज कराने का प्रयास किया जाता है, जिसे साइबर अपराधियों ने दूसरे खातों में भेज दिया हो।
साइबर ठगी के मामलों में रकम तेजी से एक खाते से दूसरे खाते में स्थानांतरित की जा सकती है। ऐसे में शिकायत दर्ज होने और संबंधित बैंक तक सूचना पहुंचने के बीच का समय महत्वपूर्ण हो जाता है। सेंटर के माध्यम से समन्वय स्थापित कर रकम को आगे स्थानांतरित होने से रोकने और पीड़ित तक वापस पहुंचाने की कार्रवाई की जाती है।
प्रदेश में चलाए गए 84 हजार साइबर जागरूकता अभियान
साइबर अपराध की रोकथाम के लिए उत्तर प्रदेश में 84 हजार साइबर अवेयरनेस ड्राइव चलाए गए हैं। इन अभियानों के तहत लोगों को फिशिंग, फर्जी वेबसाइट, डेटा चोरी, फर्जी अप्रूवल और साइबर ठगी के अन्य तरीकों के बारे में जानकारी दी गई। जागरूकता गतिविधियों को केवल कार्यालयों या पुलिस परिसरों तक सीमित नहीं रखा गया। सिनेमा हॉल से लेकर रेलवे स्टेशन तक अलग-अलग स्थानों पर लोगों को डिजिटल लेनदेन में सावधानी बरतने और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की प्रामाणिकता जांचने के बारे में बताया गया।
डिजिटल सेवाओं के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी के तरीके भी बदल रहे हैं। ऐसे में लोगों को अनजान लिंक पर क्लिक करने, संदिग्ध वेबसाइट पर निजी जानकारी साझा करने और बिना जांचे डिजिटल अनुरोध स्वीकार करने से बचने की सलाह दी जा रही है। जागरूकता अभियानों का उद्देश्य लोगों को संभावित जोखिमों की पहचान करने और किसी घटना की स्थिति में जल्द शिकायत करने के लिए तैयार करना है।
पुलिस कर्मियों को नई तकनीक की ट्रेनिंग
प्रदेश में साइबर अपराध से निपटने के लिए पुलिस कर्मियों की तकनीकी क्षमता बढ़ाने पर भी काम किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, डीजी साइबर क्राइम विनोद कुमार सिंह ने पुलिस कर्मियों को अत्याधुनिक तकनीक से लैस करने और उन्हें नई तकनीकों का प्रशिक्षण देने की दिशा में कदम उठाए हैं।
एआई-डीपफेक, म्यूल अकाउंट और साइबर अपराध के बदलते तरीकों को देखते हुए पुलिस की तकनीकी समझ बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। एआई-डीपफेक के जरिए किसी व्यक्ति की आवाज या तस्वीर से मिलती-जुलती भ्रामक सामग्री तैयार की जा सकती है। वहीं, म्यूल अकाउंट का इस्तेमाल ठगी की रकम को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए किया जा सकता है। इन तरीकों की पहचान और जांच के लिए पुलिस कर्मियों को नई तकनीकी चुनौतियों से परिचित कराया जा रहा है।
साइबर ठगी के पहले घंटे में शिकायत करना अहम
एसपी साइबर क्राइम राजेश यादव ने बताया कि साइबर फ्रॉड के मामलों में समय सबसे महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, ठगी होने के बाद पहले एक घंटे के भीतर शिकायत दर्ज कराने से रकम को होल्ड या फ्रीज कराने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
उन्होंने फिशिंग, फर्जी वेबसाइट, डेटा चोरी और फर्जी अप्रूवल को साइबर अपराधियों की ओर से इस्तेमाल किए जाने वाले तरीकों में शामिल बताया। डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करते समय उसकी प्रामाणिकता जांचने और सतर्क रहने की जरूरत पर भी जोर दिया गया।
साइबर ठगी की घटना होने पर पीड़ित को जल्द से जल्द शिकायत दर्ज करानी चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 का इस्तेमाल किया जा सकता है। शिकायत में देरी होने पर रकम के दूसरे खातों में पहुंच जाने की आशंका रहती है। इसलिए शुरुआती समय में सूचना देना रकम रोकने की प्रक्रिया में मददगार हो सकता है।
थानों में साइबर हेल्प डेस्क और लखनऊ में कॉल सेंटर
प्रदेश में साइबर अपराध से जुड़ी शिकायतों के लिए हर थाने में साइबर हेल्प डेस्क की व्यवस्था होने की जानकारी दी गई है। इसके अलावा लखनऊ में 1930 कॉल सेंटर और साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर संचालित किए जा रहे हैं। शिकायत मिलने पर संबंधित बैंक के माध्यम से रकम रोकने की कार्रवाई शुरू की जाती है।
स्थानीय स्तर पर साइबर हेल्प डेस्क और कॉल सेंटर जैसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य शिकायत दर्ज कराने और कार्रवाई की प्रक्रिया को सुलभ बनाना है। साइबर अपराध के मामलों में पुलिस, बैंक और संबंधित संस्थाओं के बीच समन्वय भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ठगी की रकम कई बार अलग-अलग खातों के जरिए स्थानांतरित की जाती है।
साइबर अपराध रोकने में समाज की भागीदारी पर जोर
साइबर अपराध की प्रकृति ऐसी है कि इसकी गतिविधियां किसी एक शहर, जिले या राज्य तक सीमित नहीं रहतीं। इसलिए इसके खिलाफ कार्रवाई में पुलिस और बैंकों के साथ-साथ समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी भी जरूरी मानी जा रही है।
स्कूल-कॉलेज, ग्राम पंचायत, स्वयं सहायता समूह, यूथ एवं स्पोर्ट्स क्लब और स्थानीय संगठनों को साइबर जागरूकता से जोड़ने पर जोर दिया गया है। इन माध्यमों से लोगों तक ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़ी जानकारी पहुंचाई जा सकती है। खासकर उन लोगों के लिए यह जानकारी उपयोगी हो सकती है, जो डिजिटल भुगतान या ऑनलाइन सेवाओं का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन साइबर ठगी के नए तरीकों से पूरी तरह परिचित नहीं हैं।
प्रदेश में साइबर ठगी की रकम फ्रीज कराने की सितंबर की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक दर्ज हुई है। इसके साथ ही जागरूकता अभियान, पुलिस प्रशिक्षण और शिकायत व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिशें जारी हैं। साइबर अपराध से होने वाले नुकसान को कम करने में तकनीकी कार्रवाई के साथ समय पर शिकायत और आम लोगों की सतर्कता की भी महत्वपूर्ण भूमिका बनी हुई है।



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