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Interview · October 8, 2026 · admin

परिसीमन और SIR: महिला आरक्षण, परिवारवाद पर बड़ा सवाल

परिसीमन और SIR को लेकर महिला आरक्षण और प्रतिनिधित्व पर बहस

मतदाता सूची के पुनरीक्षण से लेकर परिसीमन और महिला आरक्षण तक- बदलती चुनावी व्यवस्था ने भारतीय राजनीति के सामने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं

परिसीमन और SIR को लेकर भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व, मतदाता अधिकार, महिला आरक्षण और राजनीतिक समीकरणों पर बहस तेज है। भारतीय लोकतंत्र इस समय ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां चुनावी व्यवस्था से जुड़े कई बड़े सवाल एक-दूसरे से टकराते दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ परिसीमन की प्रक्रिया आने वाले वर्षों में देश के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का नक्शा बदलने वाली है, तो दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग का Special Intensive Revision यानी SIR मतदाता सूचियों की समीक्षा को लेकर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। SIR को लेकर सत्ता पक्ष इसे मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाने की कवायद बताता है, जबकि विपक्ष और उसके समर्थक इसे लेकर गंभीर सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मतदाता सूची का पुनरीक्षण और परिसीमन की बहस अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं, या इनके राजनीतिक प्रभावों को एक साथ समझने की जरूरत है?

यहीं से बहस महज वोटर लिस्ट की नहीं रहती। यह प्रतिनिधित्व, जनसंख्या, महिलाओं की भागीदारी और दशकों से स्थापित राजनीतिक समीकरणों तक पहुंच जाती है।

परिसीमन बदलेगा तो बदल सकता है राजनीतिक भूगोल

परिसीमन का मूल उद्देश्य आबादी के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व को व्यवस्थित करना है। यही वजह है कि परिसीमन केवल नक्शे पर खींची जाने वाली नई रेखाएं नहीं हैं। इसके साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व के समीकरण भी बदल सकते हैं। नई सीमाओं के साथ कुछ पुराने निर्वाचन क्षेत्र बदल सकते हैं, कुछ सीटों की प्रकृति बदल सकती है और आरक्षित सीटों का निर्धारण भी नए सिरे से हो सकता है। यही वह बिंदु है जहां लंबे समय से स्थापित राजनीतिक समीकरणों पर चर्चा शुरू होती है। जिन नेताओं और राजनीतिक परिवारों का प्रभाव दशकों से किसी खास सीट या क्षेत्र में रहा है, उनके सामने भी बदले हुए राजनीतिक भूगोल में नई परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। लेकिन यह कहना कि किसी विशेष दल या समूह ने SIR को परिसीमन रोकने के लिए ही शुरू कराया है, एक राजनीतिक आरोप है, इसे तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी होंगे।

SIR पर असली बहस मतदाता के अधिकार की है

SIR को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करते समय एक भी योग्य नागरिक का नाम गलत तरीके से न छूटे। बिहार में SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। 27 मई 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग के अधिकार और प्रक्रिया को वैध माना, हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से हटाए गए लोगों के लिए कानूनी प्रक्रिया और समीक्षा के रास्ते मौजूद रहने चाहिए। कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, बिहार SIR के दौरान करीब 65 लाख मतदाता ड्राफ्ट रोल में शामिल नहीं किए गए थे और अदालत ने ऐसे मतदाताओं की सूची तथा उनके नाम शामिल न होने के कारण सार्वजनिक करने के निर्देश भी दिए थे। इसलिए बहस का केंद्र यह होना चाहिए कि साफ-सुथरी मतदाता सूची और हर पात्र नागरिक के मतदान अधिकार-दोनों के बीच संतुलन कैसे कायम हो।

महिला आरक्षण ने बदल दी बहस की दिशा

परिसीमन की बहस का एक और बड़ा पहलू महिला प्रतिनिधित्व है। संविधान के 106वें संशोधन के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किया गया है। इसका कार्यान्वयन परिसीमन और संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। इसका अर्थ यह है कि आने वाले समय में भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का स्वरूप बड़े स्तर पर बदल सकता है। और यही बदलाव राजनीतिक दलों के लिए भी महत्वपूर्ण है। जिन सीटों पर वर्षों से पुरुष नेताओं का दबदबा रहा है, उनमें से कुछ सीटें आरक्षित होने की स्थिति में नए राजनीतिक नेतृत्व के लिए रास्ता खुल सकता है। यहां सवाल किसी एक पार्टी या परिवार का नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की उस पुरानी संरचना का है जिसमें महिलाओं की संख्या और वास्तविक राजनीतिक हिस्सेदारी लंबे समय से असमान रही है।

क्या परिवारवाद के पुराने समीकरण टूटेंगे?

भारतीय राजनीति में परिवारवाद पर बहस नई नहीं है। अलग-अलग राज्यों और दलों में राजनीतिक परिवारों का प्रभाव लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। परिसीमन और महिला आरक्षण के बाद यदि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं और आरक्षण की स्थिति बदलती है, तो स्वाभाविक रूप से कई स्थापित राजनीतिक समीकरणों को फिर से व्यवस्थित करना पड़ सकता है। किसी सीट पर लगातार एक ही राजनीतिक परिवार का प्रभाव रहा हो, लेकिन अगर वही सीट नई व्यवस्था में आरक्षित हो जाए या उसकी भौगोलिक संरचना बदल जाए, तो वहां राजनीति का स्वरूप भी बदल सकता है। यहीं से यह सवाल उठता है कि क्या भारतीय राजनीति अपने पुराने राजनीतिक गढ़ों से आगे निकलकर नए सामाजिक और लैंगिक प्रतिनिधित्व की ओर बढ़ने के लिए तैयार है?

SIR बनाम परिसीमन नहीं, पारदर्शिता बनाम अविश्वास की लड़ाई

SIR और परिसीमन को एक ही प्रक्रिया मानना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। दोनों के उद्देश्य और संवैधानिक आधार अलग हैं। SIR मतदाता सूची के पुनरीक्षण से संबंधित है, जबकि परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व से जुड़ी प्रक्रिया है। निर्वाचन आयोग स्वयं SIR-2026 के लिए अलग पोर्टल और मतदाता सेवाएं उपलब्ध करा रहा है। लेकिन राजनीति में किसी प्रक्रिया का प्रभाव केवल उसके प्रशासनिक उद्देश्य से तय नहीं होता। उसका सामाजिक और राजनीतिक असर भी महत्वपूर्ण होता है। इसलिए SIR पर उठने वाले सवालों को केवल राजनीतिक शोर कहकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा। उसी तरह SIR को सीधे परिसीमन रोकने की साजिश घोषित कर देना भी प्रमाण के बिना उचित नहीं है। लोकतंत्र में दोनों पक्षों के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी पारदर्शिता है।

असली कसौटी यही, एक भी पात्र मतदाता न छूटे

मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियादी दस्तावेजी संरचना है। उसमें गलत नाम रहना भी समस्या है और किसी पात्र नागरिक का नाम हटना भी। निर्वाचन आयोग की मौजूदा डिजिटल व्यवस्था में मतदाता अपना नाम खोजने, आवेदन की स्थिति देखने और मतदाता सूची से संबंधित सेवाओं का उपयोग कर सकता है। इसलिए SIR की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने नाम हटाए गए या कितनी प्रविष्टियां सुधारी गईं। असल सवाल यह होना चाहिए

क्या हर पात्र नागरिक का नाम सुरक्षित रहा?

क्या किसी नाम को हटाने से पहले पर्याप्त सूचना और सुनवाई मिली?

क्या पूरी प्रक्रिया राजनीतिक प्रभाव से मुक्त और पारदर्शी रही?

और सबसे महत्वपूर्ण

क्या मतदाता सूची की शुद्धता बढ़ाने के साथ नागरिक के मतदान के अधिकार की भी उतनी ही मजबूती से रक्षा हुई?

लोकतंत्र का अगला अध्याय प्रतिनिधित्व का होगा

भारत की राजनीति आने वाले वर्षों में केवल चुनाव जीतने और हारने की राजनीति नहीं रहने वाली। परिसीमन, महिला आरक्षण, मतदाता सूची और प्रतिनिधित्व से जुड़े फैसले यह तय करेंगे कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में कौन प्रतिनिधित्व करेगा और किस सामाजिक संरचना का प्रतिनिधित्व करेगा। यही वजह है कि SIR को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रिया से मिलना चाहिए। परिसीमन पर खुली बहस होनी चाहिए। महिला आरक्षण के प्रभाव पर खुली बहस होनी चाहिए। परिवारवाद पर भी खुली बहस होनी चाहिए। और मतदाता सूची में एक-एक नाम की शुद्धता पर भी उतनी ही गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए। क्योंकि अंततः लोकतंत्र की असली ताकत किसी दल, सरकार या संस्था में नहीं होती।

लोकतंत्र की ताकत उस नागरिक के हाथ में होती है, जिसका नाम मतदाता सूची में दर्ज है और जिसे बिना डर, बिना भेदभाव और बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपने मत का इस्तेमाल करने का अधिकार है।

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