मणिकर्णिका घाट तक शव पहुंचाने के लिए प्रति व्यक्ति 500 रुपये, एक शव के लिए करीब 2500 रुपये तक भुगतान; पैसे न हों तो मुफ्त में भी कंधा देते हैं ये लोग
वाराणसी: काशी… जहां जीवन और मृत्यु को लेकर सदियों से अपनी अलग पहचान रही है। यहां मणिकर्णिका घाट पर हर दिन बड़ी संख्या में अंतिम संस्कार के लिए शव पहुंचते हैं। लेकिन अंतिम यात्रा के इस सफर में एक ऐसी परेशानी भी है, जिसका सामना खास तौर पर उन परिवारों को करना पड़ता है जो अकेले हैं या जिनके पास शव को घाट तक ले जाने के लिए पर्याप्त लोग नहीं हैं।
अब इसी जरूरत ने वाराणसी में एक नई तरह की सेवा को जन्म दिया है, किराए पर कंधा देने की सेवा।

The Public Lens की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया है कि मैदागिन से मणिकर्णिका घाट तक शव को कंधा देकर पहुंचाने के लिए लोग उपलब्ध हैं। इसके लिए परिवार को प्रति व्यक्ति करीब 500 रुपये का भुगतान करना पड़ता है। एक शव को घाट तक पहुंचाने के लिए आमतौर पर करीब 2500 रुपये तक खर्च आता है। लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू और भी मानवीय है।
अगर किसी परिवार के पास पैसे नहीं हैं, तो ये लोग मुफ्त में भी कंधा देने की सेवा करते हैं।

काशी में अंतिम यात्रा का भी अपना संघर्ष
वाराणसी आने वाले लोगों के लिए मणिकर्णिका घाट सिर्फ एक घाट नहीं, बल्कि अंतिम संस्कार से जुड़ी सदियों पुरानी परंपरा का केंद्र है। हर दिन बड़ी संख्या में लोग अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए यहां पहुंचते हैं। लेकिन शव को घाट तक पहुंचाना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। खासकर मैदागिन से मणिकर्णिका घाट तक का रास्ता ऐसा है, जहां वाहन से सीधे पहुंचना संभव नहीं होता। नो-व्हीकल जोन की वजह से शव को एक निश्चित दूरी तक कंधे पर लेकर जाना पड़ता है। यही वह जगह है जहां कई परिवारों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है
शव को घाट तक ले जाएं तो कैसे?
परिवार में लोग कम हों, बुजुर्ग हों, महिलाएं हों या कोई अकेला व्यक्ति अंतिम संस्कार के लिए आया हो, ऐसे में कंधे की जरूरत सबसे बड़ी परेशानी बन जाती है।
यहीं से शुरू हुई ‘किराए के कंधे’ की कहानी
इस जरूरत को कुछ लोगों ने सेवा के एक नए रूप में बदल दिया। अब ऐसे लोग उपलब्ध हैं जो अंतिम यात्रा में शव को कंधा देकर मणिकर्णिका घाट तक पहुंचाने में परिवार की मदद करते हैं। इसके लिए प्रति व्यक्ति करीब 500 रुपये लिए जाते हैं। एक शव को घाट तक पहुंचाने के लिए करीब पांच लोगों की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में परिवार को लगभग 2500 रुपये का भुगतान करना पड़ता है। यानी जिस परिवार के पास अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था के लिए लोग नहीं हैं, उसके लिए ये लोग उस वक्त कंधा बनते हैं जब सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
पैसे नहीं हैं तो भी नहीं रुकती अंतिम यात्रा
इस पूरी कहानी का सबसे मानवीय पहलू यही है। अगर किसी परिवार के पास पैसे नहीं हैं, तो कंधा देने वाले लोग मुफ्त में भी सेवा करते हैं। यानी यहां सिर्फ पैसे कमाने की बात नहीं है। इन लोगों के लिए यह काशी में अंतिम यात्रा के दौरान किसी जरूरतमंद का साथ देने की कोशिश भी है। एक तरफ इसके बदले भुगतान किया जाता है, ताकि इस काम से जुड़े लोगों की रोजी-रोटी चल सके। दूसरी तरफ जरूरतमंद परिवार के सामने आर्थिक मजबूरी हो तो सेवा मुफ्त में भी उपलब्ध कराई जाती है।
मैदागिन से मणिकर्णिका तक करीब डेढ़ किलोमीटर का सफर
मैदागिन से मणिकर्णिका घाट की दूरी करीब 1.5 किलोमीटर है। सुनने में यह दूरी बहुत ज्यादा नहीं लगती, लेकिन शव को कंधे पर लेकर भीड़भाड़ वाले रास्ते से घाट तक पहुंचाना शारीरिक रूप से आसान काम नहीं है। खासकर तब, जब परिवार में पहले से ही दुख और तनाव का माहौल हो। किसी अपने को खोने के बाद परिवार का ध्यान अंतिम संस्कार की व्यवस्था पर होता है। ऐसे समय में शव को घाट तक ले जाने के लिए पर्याप्त लोगों की व्यवस्था करना भी कई बार बड़ी चुनौती बन जाता है। यहीं पर ये कंधे परिवार के लिए सहारा बनते हैं।
अकेले आए लोगों के लिए सबसे बड़ा सहारा
इस सेवा की जरूरत खास तौर पर उन लोगों को पड़ती है जो अकेले या बहुत कम लोगों के साथ अंतिम संस्कार के लिए काशी पहुंचते हैं। कई बार परिवार का कोई एक सदस्य ही शव लेकर वाराणसी पहुंचता है। ऐसे में उसके सामने सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक मुश्किल भी होती है।
शव को घाट तक कौन ले जाएगा?
यही सवाल इस सेवा की जरूरत को समझाता है। कंधा देने वाले लोग उस परिवार के साथ खड़े होते हैं और अंतिम यात्रा को पूरा कराने में मदद करते हैं।

क्या यह ‘स्टार्टअप’ है या सेवा?
काशी में शुरू हुई यह व्यवस्था एक तरह से अंतिम यात्रा से जुड़ी सेवा का नया मॉडल बनती दिखाई दे रही है। जहां एक तरफ इसके लिए निर्धारित भुगतान लिया जाता है, वहीं जरूरतमंदों के लिए मुफ्त सेवा की व्यवस्था भी है। इसी वजह से इसे केवल कमाई के नजरिए से देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। यह उस सामाजिक जरूरत का जवाब भी है, जो काशी जैसे शहर में हर दिन सामने आती है। जहां हजारों लोग अंतिम संस्कार के लिए आते हैं और हर किसी के साथ परिवार के पर्याप्त सदस्य मौजूद हों, यह जरूरी नहीं।
काशी की परंपरा में जुड़ गया एक नया अध्याय
काशी की पहचान सदियों से जीवन और मृत्यु के बीच के रिश्ते से जुड़ी रही है। मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार की परंपरा इसी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का हिस्सा है। लेकिन बदलते समय में परिवारों की संरचना बदली है। शहरों में रहने वाले लोगों के परिवार छोटे हुए हैं। कई लोग अकेले रहते हैं। दूसरे शहरों से अंतिम संस्कार के लिए आने वाले लोगों की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे में अंतिम यात्रा के दौरान एक कंधे की जरूरत भी अब एक सामाजिक जरूरत बनती जा रही है। और इसी जरूरत को पूरा करने वाले लोग काशी में एक अलग तरह की सेवा दे रहे हैं।
कंधा सिर्फ पैसे का सौदा नहीं… किसी की आखिरी यात्रा में साथ है
वाराणसी में किराए पर कंधा देना हमारे समाज में सिर्फ एक शारीरिक जिम्मेदारी नहीं माना जाता। यह अंतिम विदाई का हिस्सा है। लेकिन जब किसी परिवार के पास कंधा देने के लिए लोग नहीं होते, तब यही काम एक व्यावहारिक जरूरत बन जाता है। काशी में किराए पर कंधा देने की यह व्यवस्था इसी जरूरत की तस्वीर सामने लाती है।
वाराणसी में किराए पर कंधा प्रति व्यक्ति 500 रुपये… करीब 2500 रुपये में एक शव को घाट तक पहुंचाना… और पैसे न हों तो मुफ्त में कंधा देना।
यही इस कहानी का सबसे अलग पहलू है। यह सिर्फ एक सेवा नहीं, बल्कि काशी में किसी अनजान इंसान की अंतिम यात्रा में साथ खड़े होने की कोशिश भी है। और शायद इसी वजह से इस पूरी कहानी को सिर्फ “किराए पर कंधा” कहकर खत्म नहीं किया जा सकता।
क्योंकि काशी में जिंदगी की भीड़ के बीच, किसी की आखिरी यात्रा में कंधा देने वाला भी आखिर किसी न किसी का अपना ही बन जाता है।



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